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पं आद्याचरण झा एवं शांति जैन की जयंती पर, राजप्रिया रानी के काव्य-संग्रह का हुआ लोकार्पण, हुई कवि-गोष्ठी
पं आद्याचरण झा एवं शांति जैन की जयंती पर, राजप्रिया रानी के काव्य-संग्रह का हुआ लोकार्पण, हुई कवि-गोष्ठी
by
Arun Pandey,
July 03, 2026
in
बिहार
स्त्री-चेतना और मनोगत भावों की नैसर्गिक अभिव्यक्ति है "आँगन के फूल"
पटना, ०३ जुलाई। स्त्री-चेतना और नारी-मन के आंतरिक-भावों की नैसर्गिक अभिव्यक्ति है, कवयित्री राजप्रिया रानी का काव्य-संग्रह "आँगन के फूल:। संग्रह की कविताएँ स्त्री-विमर्श का आह्वान तो करती ही हैं, मन की अनेक गाँठों को खोलती भी हैं।
यह बातें शुक्रवार को, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, संस्कृत के महान आचार्य पं आद्याचरण झा और तपस्विनी-कवयित्री डा शांति जैन की जयंती पर आयोजित पुस्तक-लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि आद्या बाबू ने अपना संपूर्ण जीवन संस्कृत भाषा के सरंक्षण और उन्नयन में अर्पित कर दिया। वे संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। शांति जी एक ऐसी काव्य-तपस्विनी थीं कि उन्होंने विवाह तक नहीं किया और काव्य-साहित्य की एकांतिक सेवा करती रहीं। पद्म अलंकरण से विभूषित हुईं शांति जी लोक संस्कृति और गीति-काव्य की पुण्य सलीला सरिता थीं।
समारोह का उद्घाटन करते हुए सिक्किम के पूर्व राज्यपाल गंगा प्रसाद ने कहा कि पं आद्याचरण झा और डा शांति जैन, दोनों ने ही भाषा और साहित्य की बहुत बड़ी सेवा की। आद्या बाबू संस्कृत के विद्वान और शांति जी हिन्दी और लोक-भाषाओं की विदुषी थीं। संस्कृत-सेवा के लिए आद्या बाबू को राष्ट्रपति सम्मान और लोक-संस्कृति तथा हिन्दी की सेवा के लिए शांति जी को पद्मश्री अलंकरण प्रदान किया गया।
पुस्तक पर अपना विचार रखते हुए कवि सिद्धेश्वर ने कहा कि राजप्रिया जी की कविताओं में भाषा की सहजता, अभिव्यक्ति की मौलिकता और जीवन का यथार्थ है। उनकी रचनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि साहित्य में परिपक्वता केवल अनुभव की आयु से ही नहीं, बल्कि संवेदना की गहराई से आती है।
वरिष्ठ कवि आचार्य विजय गुंजन ने पुस्तक पर समीक्षात्मक टिप्पणी की और कहा कि राजप्रिया की रचनाओं में अनेक विविधताएँ लक्षित होती हैं। उनमें बालमन की किलकारियाँ भी हैं और किशोर-मन की जिज्ञासा और युवावस्था के यौवन का आभास भी। इनकी कविताएँ जीवन के प्रायः सभी पक्षों को स्पर्श करती हैं।
भारतीय रेल में राजभाषा अधिकारी रहे साहित्यकार राजेश रंजन, प्रो जंगबहादुर पाण्डेय, रामयतन यादव, डा ऋचा वर्मा, विभारानी श्रीवास्तव, कल्पना जैन आदि ने भी अपने विचार रखे।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, कुमार अनुपम, ईं अशोक कुमार, ए आर आज़ाद, डा प्रतिभा रानी, शमा कौसर शमा, डा सुषमा कुमारी, मोईन गिरीडीहवी, डा शमा नासमीन नाजां, चित्तरंजन लाल भारती,बाँके बिहारी साव, इन्दुभूषण सहाय, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, नन्दन कुमार, डा अंकेश कुमार आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं से समारोह को मधुरता प्रदान की। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा कृतज्ञता-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
डा मनोज गोवर्द्धनपुरी, डा चंद्रशेखर आज़ाद, बीना गुप्ता, विमलेन्दु भूषण कुमार, रंजन कुमार अमृतनिधि, अश्विनी कविराज, सुनिता सोनी, राजीव कृष्णन, आर्याश्री, अंजनी कुमार, तृप्ति नारायण झा आदि बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे।
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