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बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में "लेख्य-मंजूषा" के तत्त्वावधान में आयोजित हुई कथा-संगोष्ठी)
बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में "लेख्य-मंजूषा" के तत्त्वावधान में आयोजित हुई कथा-संगोष्ठी)
by
Arun Pandey,
June 14, 2026
in
बिहार
कथा-कहानी सहस्राब्दियों से मानव-मन को प्रेरणा देती आयी है
काव्य-संकलन “विह्वल हृदय धारा” का हुआ लोकार्पण
पटना, १४ जून। कथा-कहानी सहस्राब्दियों से मानव-मन को प्रेरणा देती आयी है। बाल-मन पर इसका सबसे गहरा प्रभाव होता है। अनेक महापुरुषों और महादेवियों को अपनी नानी-दादी से सुनी कहानियों ने मानसिक-बाल प्रदांन किया तथा उनमे सद्गुणों का विकास किया। कहानियाँ वैसी ही गढ़ी जानी चाहिए जो मन का रंजन करते हुए, समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करें। इसे अपनी कुंठा निकालने अथवा समाज को खंडित करने वाले नकारात्मक विचारों के संप्रेषण का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। साहित्यकारों का कर्तव्य समाज के दोषों को दूर कर, उसे मांगलिक बनाना है। विश्व को सुंदर बनाने वाली रचनाएँ ही बड़ी कही जा सकती हैं।
यह बातें रविवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में साहित्यिक संस्था "लेख्य-मंजूषा", पटना तत्त्वावधान में आयोजित हुए साहित्योत्सव का उद्घाटन करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि कथा-साहित्य में लघु-कथा विधा बहुत तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है। इसमें अत्यंत सूक्ष्मता से अत्यंत गहरा प्रभाव उत्पन्न करने की शक्ति है। नव-लेखकों को इसकी मर्यादा, इसकी सूक्ष्मता और संक्षेपण का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इसमें वर्णन और विस्तार के लिए स्थान नही होता। लघुता, सूक्ष्मता और संक्षेपण में ही इसका सौंदय और बल है।
डा सुलभ ने इस अवसर पर लेख्य-मंजूषा की ओर से संस्था की अध्यक्ष विभारानी श्रीवास्तव के सम्पादन में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका "साहित्यिक स्पंदन" के १० वे वर्ष के ३८ वें अंक तथा साझा काव्य-संग्रह "विह्वल हृदय धारा" का लोकार्पण भी किया।
उद्घाटन-सत्र के पश्चात कहानी-सत्र आरंभ हुआ, जिसमें वरिष्ठ लेखक डा ध्रुव कुमार तथा डा अनीता राकेश ने अपने विचार रखे। इसकी शुरुआत महाराष्ट्र की लेखिका नीना मन्दिलवार और प्रियंका श्रीवास्तव "शुभ्र" ने कहानी के तत्त्वों पर प्रश्नों के साथ की। इस सत्र में डा प्रमोद कुमार ने समीक्षात्मक आलेख पढ़े तथा डा ऋचा वर्मा और रंजना सिंह ने डा सतीश राज पुष्करणा की लघुकथा "विश्वास" पर अपनी-अपनी समीक्षा का पाठ किया। इस सत्र में नूतन सिन्हा ने अपने संस्मरण का पाठ किया।
दूसरा सत्र लघुकथा-पाठ का था, जिसमें मधुरेश नारायण ने "क्रूर इंतज़ार", डा उषा सिंह ने "थप्पड़", पूनम कतरियार ने "मारीच", आशा रघुदेव ने "भरोसे की उम्र", सागरिका राय ने "कबाड़", अमृता सिन्हा ने "दैत्य का दर्जा", डा शशि भूषण सिंह ने "यह भी देश सेवा", प्रो सुनील कुमार उपाध्याय ने "समय का फेर", एम के मधु ने अपशकुन”, किलकारी के छात्र सुमन कुमार ने "टूटे चाँद के बहाने", ख़ुशी कुमारी ने "अंदर का युद्ध", अतुल राय ने दरारें भरती नहीं, अनुराग कुमार ने भँवर, उर्मिला वर्मा ने “कृष्णा” शीर्षक से लघुकथा का पाठ किया। मंच का संचालन विभारानी श्रीवास्तव ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन रवि भूषण श्रीवास्तव ने किया।
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