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विशारद" जी की १२६वीं जयंती पर बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में श्रद्धा पूर्वक किए गए स्मरण, आयोजित हुई लघुकथा-गोष्ठी
विशारद" जी की १२६वीं जयंती पर बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में श्रद्धा पूर्वक किए गए स्मरण, आयोजित हुई लघुकथा-गोष्ठी
by
Arun Pandey,
June 11, 2026
in
बिहार
दिनकर ने कहा था -
विशारद जी की प्रतिमा लगा,स्वर्ण-मेखला से ऋंगार से ही सच्ची श्रद्धांजलि
"
पटना, ११ जून। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के रजत जयंती समारोह की अध्यक्षता करते हुए राष्ट्र्कवि रामधारी सिंह "दिनकर" ने, सम्मेलन की स्थापना के सूत्रधार बाबू रामधारी प्रसाद "विशारद" को श्रद्धा-पूर्वक स्मरण किया था और कहा था कि साहित्य सम्मेलन अपने प्रांगण में उनकी भव्य प्रतिमा लगाए और उसे स्वर्ण-मेखला से घेराबंदी करे। इससे कम में उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि नही हो सकती। "विशारद" के महान उद्यम से ही सम्मेलन की स्थापना हुई थी। वे इसके मुख्य सूत्रधार थे। सबसे पहले इनके ही मन में प्रांतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना का विचार आया और उन्होंने देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद की स्वीकृति प्राप्त कर, हिन्दी सेवियों को १९ अक्टूबर, १९१९ को मुज़फ़्फ़रपुर के हिंदू भवन में आहूत किया, जिसमें साहित्य सम्मेलन की स्थापना का निर्णय लिया गया। अपने जीवन-काल तक वे सम्मेलन के पर्याय बने रहे।
यह बातें, गुरुवार को, साहित्य सम्मेलन में, "विशारद" जी की १२६वीं जयंती पर आयोजित समारोह और लघुकथा गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि विशारद जी, भागलपुर के बौंसी में आहूत हुए, सम्मेलन के १९वें अधिवेशन के सभापति चुने गए थे। इसके पूर्व वे अनेक वर्षों तक सम्मेलन के प्रधानमंत्री और उपसभापति भी रह चुके थे। हिन्दी के उन्नयन के लिए की गयी उनकी सेवाओं को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्हीं के कारण यह संस्था हिन्दी की अमूल्य सेवाएँ कर सकी है। सम्मेलन परिसर में उनकी प्रतिमा लगे इसके लिए हम शीघ्र प्रयास आरम्भ करेंगे।
समारोह का उद्घाटन करते हुए, पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मान्धाता सिंह ने कहा कि हिन्दी साहित्य को जिन आदरणीय विभूतियों ने समृद्धि प्रदान की, उनमें "विशारद" जी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। साहित्य सम्मेलन की स्थापना और इसके संचालन में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगाया। वरिष्ठ साहित्यकार प्रो सुनील कुमार अध्याय, कवयित्री आराधना प्रसाद, कमल नयन श्रीवास्तव, चंदा मिश्र, मिथिलेश कुमार सिन्हा तथा प्रवीर कुमार पंकज ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित लघुकथा-गोष्ठी में राँची विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे डा जंगबहादुर पाण्डेय ने "ममता", डा पुष्पा जमुआर ने "लहरें", विभा रानी श्रीवास्तव ने "अंत की साँस", डा पूनम आनन्द ने "दान", कुमार अनुपम ने "अहिंसा", सिद्धेश्वर ने "बसेरा", डा समरेंद्र नारायण आर्य ने "फिर कभी", ज्योति पास्कल ने "मौसम का असर", सागरिका राय ने "नियामत" तथा इन्दु भूषण सहाय ने "वाह रे इंसान" शीर्षक से लघुकथा का पाठ किया। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
रंजन कुमार अमृतनिधि, राजेश राज, प्रेम प्रकाश, सत्येंद्र सिंह, संतोष कुमार, नरेश कुमार, अनिल कुमार, नन्दन कुमार मीत आदि प्रबुद्धजन समारोह में उपस्थित थे।
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