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महाकवि सुमित्रानन्दन पंत की जयंती पर बिहार हिन्दी साहित्य-सम्मेलन में श्रद्धापूर्वक किए गए स्मरण, आयोजित हुई कवि-गोष्ठी
महाकवि सुमित्रानन्दन पंत की जयंती पर बिहार हिन्दी साहित्य-सम्मेलन में श्रद्धापूर्वक किए गए स्मरण, आयोजित हुई कवि-गोष्ठी
by
Arun Pandey,
May 20, 2026
in
बिहार
प्रकृति के मनोरम चितेरे और छायावाद-युग के महान कवि थे पंत
पटना, २० मई। प्रकृति के मनोरम चितेरे महाकवि सुमित्रानन्दन पंत छायावाद-युग के प्रमुख स्तंभ और मानवतावादी कवि थे। उनकी रचनाओं के विराट विस्तार में प्रकृति का चित्ताकर्षक चित्रण तो है ही, समाज की पीड़ा और चिंता के साथ मानवतावादी-समाजवाद भी है, जो प्रगतिवाद के रास्ते से अध्यात्म-वाद पर संपन्न और संपूर्ण होता है।
यह बातें बुधवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती-समारोह एवं कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि, पंत जी की रचना-प्रक्रिया को समझने के लिए, उनके जीवन के चार काल-खंडों का अलग-अलग अध्ययन करना आवश्यक है। कवि अपने यौवन में, प्रेम और प्रकृति तथा उनके उदात्त सौंदर्य के चितेरे के रूप में दिखाई देते हैं। इसके पश्चात उन पर, साम्यवाद के जनक मार्क्स और प्रगतिवाद का प्रभाव दिखता है। फिर वे महात्मा-गाँधी से प्रभावित होकर सेवा और मानवता-वादी दृष्टिकोण के ध्वज-वाहक दिखते हैं। और, जीवन के चौथेपन में उन पर महर्षि अरविंदो का प्रभाव है, जिसमें उनकी आध्यात्मिक-चेतना उर्द्धगामी होती दिखाई देती है। उन्हें भारत सरकार के पद्म-भूषण अलंकरण, साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। साहित्य सम्मेलन ने उन्हें "विद्या-वाचस्पति" की उपाधि दी थी।
वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र "करुणेश" ने कहा कि छायावाद-युग के चार स्तंभों निराला, पंत, महादेवी और जय शंकर प्रसाद में पंत जी ही प्रतिनिधि कवि हैं। वे संस्कृत, हिन्दी और अवधि के अधिकारी विद्वान थे। उनकी कविताएँ प्रेम और प्रकृति को दर्शन की ओर ले जाती है।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरम्भ चंदा मिश्र ने वाणी-वंदना से किया। अपनी ग़ज़ल पढ़ते हुए श्री करुणेश ने कहा कि "दिन, रात की तरह है और स्याह सवेरा है/ मिल जुल के घटाओं ने आकाश को घेरा है/ गिरगिट की तरह रह-रह जो रंग बदलता हो/ करुणेश समझ लो, वह मेरा है न तेरा है।"
वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह ने अपनी रचना पढ़ते हुए कहा कि “ज़रूरत इस बात की नहीं कि हम रक्षा कवच से अपने आप को ढाँपते रहे/बल्कि जीवन के अंतस्थल से नयी सर्जनाओं और नए अहसासों को ढूँढ निकालने की ज़रूरत है"।
कवयित्री ज्योति मिश्रा ने अपना गीत पढ़ते हुए कहा कि "प्रेम भाव से लिखे हामारे ग्रंथ सभी बेमानी निकले/ जिसको गंगाजल समझा था, वो बारिश के पानी निकले। इंद्रधनुष के सात रंग का जीवन में अनुवाद था जिनसे/ नैनों की थी प्रेम-वीथिका,अंतस का संवाद था जिनसे/ वो निर्मोही रंग बदलते मौसम जैसे प्राणी निकले।"
वरिष्ठ कवि प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, डा एम के मधु, विभारानी श्रीवास्तव, डा पूनम देवा, शमा कौसर शमा, मृत्युंजय गोविंद, डा सीमा रानी, शंकर शरण मधुकर, डा शालिनी पाण्डेय, सूर्य उपाध्याय, नीता सहाय, बाँके बिहारी साव, इंदु भूषण सहाय, आनन्द किशोर मिश्र आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी पीयूष-धारिणी काव्य-रचनाओं से महाकवि पंत को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।
अतिथियों का स्वागत सम्मेलन के अर्थ मंत्री कुमार अनुपम ने तथा तथा धन्यवाद ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने किया।
आयोजन में सच्चिदानन्द सिन्हा, शोभा यादव, मोहम्मद फ़हीम, अरविंद कुमार, नन्दन कुमार मीत, कुमारी डौली समेत बड़ी संख्या में कविगण और सुधी श्रोता उपस्थित थे।
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