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पटना,06अप्रैल। बिहार के पूर्व मंत्री एवं पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने आज सीएम नीतीश कुमार के कामकाज की बखिया उधेड़ी कहा-नीतीश जी राज्यसभा के लिए चुन लिए गए हैं। विधान परिषद की सदस्यता से भी उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। अब लोग अनुमान लगा रहे हैं कि मुख्यमंत्री पद से वो कब इस्तीफा देंगे। लेकिन उनकी रोज़मर्रा की गतिविधियाँ देखकर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि वो अब मुख्यमंत्री नहीं रहने वाले हैं। रोज़ कहीं न कहीं जाना, निर्माण कार्यों की समीक्षा करना, “यह बनाओ, वह बनाओ” — यह सिलसिला लगातार जारी है। यह सच है कि निर्माण के मामले में नीतीश कुमार ने बहुत काम किया है . उसका शायद देश में रिकॉर्ड होगा. लेकिन सवाल यह है कि निर्माण किस तरह का हुआ है? मेरे अनुभव में, बड़ी मात्रा में ऐसा निर्माण हुआ है जिसकी आज कोई उपयोगिता नहीं है। करोड़ों-अरबों रुपये खर्च हुए, लेकिन उसका समुचित उपयोग नहीं हो रहा। एक उदाहरण देता हूँ। हाल ही में मैं पीएमसीएच अस्पताल गया था। इस अस्पताल से हमारा पुराना रिश्ता है. एक समय मेरा, मेरे पिताजी का, मेरी माँ का इलाज वहीं हुआ है. अब वहाँ एक विशाल नया भवन बना है, लेकिन हालत यह कि आदमी अंदर जाए तो रास्ता ही भूल जाए. मेरे साथ यह हुआ. जब जानकारी ली तो पता चला कि पुराने अस्पताल के हिसाब से ही डॉक्टर, नर्स और टेक्नीशियन आदि की संख्या वहां पूरी नहीं है। ऐसे में पाँच हजार बेड वाले अस्पताल का संचालन कैसे होगा? यह हाल कई जगहों पर है। मशीनें आ गईं, लेकिन चलाने वाले लोग नहीं हैं। स्कूलों में कंप्यूटर बाँट दिए गए — करोड़ों खर्च हुए — लेकिन उन्हें चलाने वाला कोई नहीं। “दशरथ मांझी जी” के नाम पर संस्थान बन गया है. शानदार. लेकिन बंद पड़ा है। नीतीश जी के मन में अचानक डॉल्फिन के प्रति प्रेम उमड़ा. घोषणा हो गई कि इस पर शोध केंद्र बनेगा. करोड़ों का परिसर बना. लेकिन वहां झाड़ू लगाने वाला भी कोई नहीं है. आर्य भट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय बने कितने दिन हो गये. करोड़ों खर्च हुए. नियमित कुलपति तक नहीं है वहाँ. सुना है उस परिसर के भवन किराए पर दिए जा रहे. पहले जो योजनाएँ थीं , जैसे लड़कियों के लिये साइकिल योजना. इस योजना ने बिहार का सामाजिक दृश्य बदल दिया था। गाँवों में लड़कियाँ कतार में साइकिल चलाती दिखती थीं, बाजारों में घर की ख़रीददारी करते दिखती थीं. लेकिन अब नीतीश जी साइकिल के एवज में नगद पैसे दे रहे हैं. अब स्कूल या बाज़ार में साइकिल पर लड़कियां नहीं दिखती हैं. पुराना दृश्य धीरे-धीरे गायब हो गया। नीतीश जी के बारे में यह भी सच है कि उन्होंने बिजली पहुँचाई, सड़कें बनाईं। जहाँ अत्यधिक निर्माण होता है, वहाँ भ्रष्टाचार भी बढ़ता है — यह पुराना सिद्धांत है। आज बिहार में हर स्तर पर कमीशन की व्यवस्था दिखती है — ऊपर से नीचे तक। इसीलिए आए दिन छापेमारी की खबरें आती हैं। साधारण कर्मचारियों के यहां से अकूत संपत्ति बरामद होती है. सबसे चिंताजनक बात है गैरबराबरी का बढ़ना। अगर भारत के राज्यों में तुलना की जाए, तो बिहार में असमानता बहुत तेज़ी से बढ़ी है। पटना और सीमांचल की तुलना कर लीजिए — अंतर साफ दिखता है। नीतीश जी लंबे समय से मुख्यमंत्री रहे हैं। यह पद अब उनकी आदत का हिस्सा बन गया है। विजय कुमार चौधरी ने कहा था कि “हमें आपके साथ काम करने की आदत हो गई है।” लेकिन सवाल यह है कि क्या खुद नीतीश जी को भी सत्ता में बने रहने की आदत हो गई है? उनके व्यवहार को देखकर कभी-कभी लगता है कि स्थिति सामान्य नहीं है। आगे क्या होगा, यह देखना होगा। मेरी व्यक्तिगत शुभेच्छा उनके साथ है। एक समय था जब हम चाहते थे कि नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनें। लेकिन राजनीति में जो मोड़ आए, जो फैसले हुए — उन्हें याद करके आज आश्चर्य भी होता है और कभी-कभी हँसी भी आती है। 2013 में जब हम साथ थे, हमने चेताया था कि नरेंद्र मोदी को हल्के में मत लीजिए। लेकिन उस चेतावनी की वजह से मैं पार्टी से ही बाहर कर दिया गया. व्यक्तिगत जीवन में ही नहीं, राजनीति में भी स्वाभिमान बहुत महत्वपूर्ण होता है। जब आप अपने ही घोषित आदर्शों — गांधी, लोहिया, जयप्रकाश और कर्पूरी ठाकुर का नाम ले कर राजनीति कर रहें हैं. एक समय आप मोदी जी को लेकर कहा करते थे कि जिसका नाम लेने से करोड़ों अल्पसंख्यकों के मन में डर पैदा हो जाता है उसके साथ दिखाई दूँ, यह कैसे संभव है ! आज उसी आदमी के आप पैर छू रहे हैं ! क्या कभी आपने सोचा है कि जिन विभूतियों को आज तक आपने अपना राजनीतिक आदर्श माना, मोदी जी का पैर छू कर आप उनकी महिमा बढ़ा रहे हैं या कलंकित कर रहें हैं ?