नई दिल्ली,12 जनवरी। सुप्रीम कोर्ट ने आज संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेषाधिकारों के तहत तीन कृषि कानून पर रोक लगादीहै। 47 दिनों से चल रहे किसान आंदोलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सोमवार को चीफ जस्टिस एसएस बोबडे ने सरकार को न सिर्फ फटकार लगाई थी बल्कि कड़ी चेतावनी भी दी थी कि अगर सरकार कानूनों पर रोक नहीं लगा सकती, तो अदालत लगा देगी। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेषाधिकारों के तहत यह स्पष्ट किया कि ये रोक कानून पर नहीं इसके लागू होने पर होगी।

चीफ जस्टिस के अनुच्छेद 142 के हवाले पर एक बार फिर यह बहस शुरू हो गई है कि सुप्रीम कोर्ट किसी काम को अपनी मर्जी से कैसे रोक सकता है?

क्या है अनुच्छेद 142
अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट का वो साधन है जिसके तहत वह ऐसी महत्त्वपूर्ण नीतियों में बदलाव कर सकता है जो जनता को प्रभावित करती हैं। जानकारों के अनुसार- सुप्रीम कोर्ट इसके तहत सरकार के किसी भी फैसले पर रोक लगा सकता है। जब तक किसी अन्य कानून को लागू नहीं किया जाता तब तक सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सर्वोपरि माना जाएगा। अपने न्यायिक निर्णय देते समय न्यायालय ऐसे निर्णय दे सकता है जो इसके समक्ष लंबित पड़े किसी भी मामले को पूर्ण करने के लिए जरूरी हों और यह आदेश संपूर्ण भारत संघ में तब तक लागू होंगे जब तक इससे संबंधित किसी अन्य प्रावधान को लागू नहीं कर दिया जाता है।

पहले भी उठे थे सवाल
यह पहली बार नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट को संविधान के तहत मिले इस विशेषाधिकार पर बहस ना छिड़ी हो। विशेषज्ञों के अनुसार- अब समय आ चुका है जब सर्वोच्च न्यायालय को यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि अनुच्छेद 142 का उपयोग वह किस प्रकार के मामलों में कर सकता है। इसके लिए दिशा-निर्देशों का विनियमन आवश्यक है। उधर न्यायाधीश बेंजामिन कारडोजो इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनके अनुसार- न्यायाधीश कोई आदर्श नहीं है कि उसके द्वारा लिए गए सभी फैसलों को कानूनी प्रावधानों से भी सर्वोपरि माना जाए।

इन मामलों में पहले भी हुआ अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल
सुप्रीम कोर्ट की ओर अन्य कुछ मामलों में भी संविधान द्वारा मिली इस ताकत का इस्तेमाल किया गया है।

सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामला
साल 2020 में चर्चा में रहे सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस शक्ति का इस्तेमाल करते हुए मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। जस्टिस ऋषिकेश रॉय ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि लोग सच जानना चाहते हैं, इसलिए कोर्ट ने विशेष शक्ति का प्रयोग करते हुए इस मामले को सीबीआई के हाथों में सौंपने का निर्णय लिया है।

यूनियन कार्बाइड मामला
भोपाल गैस त्रासदी पीड़ितों से जुड़े यूनियन कार्बाइड मामले को भी सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 से संबंधित बताया था। इसमें न्यायालय ने यह महसूस किया कि गैस के रिसाव से पीड़ित हज़ारों लोगों के लिए मौजूदा कानून से अलग फैसला देना जरूरी होगा। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों को 470 मिलियन डॉलर का मुआवजा दिलाने के साथ यह भी कहा था कि अभी पूर्ण न्याय नहीं हुआ है।

अयोध्या भूमि विवाद
अयोध्या भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 के तहत मिली खास शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मुस्लिम पक्ष को ज़मीन दी थी। साथ ही सरकारी ट्रस्ट में निर्माही अखाड़े को शामिल करने की बात भी कही थी। फैसले में विवादित ज़मीन पर रामलला का दावा माना गया था। मुस्लिम पक्ष को कहीं और पांच एकड़ जमीन देने का फैसला दिया गया। यह फैसला नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों की बेंच ने दिया था।

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामला
अयोध्या विवाद से ही जुड़े बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में भी 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुच्छेद के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल करते हुए मामले को रायबरेली कोर्ट से लखनऊ की विशेष अदालत में में ट्रांसफर करने के आदेश दिए थे। मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी समेत अन्य आरोपी थे।

राज्य राजमार्गों क पास शराब बिक्री पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने राजमार्गों पर शराब की बिक्री पर रोक के मामले में भी संविधान की इस शक्ति का इस्तेमाल किया था। केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी करके केवल राष्ट्रीय राजमार्गों के साथ लगे शराब के ठेकों को प्रतिबंधित किया था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य राजमार्गों से 500 मीटर की दूरी तक स्थित शराब की दुकानों पर भी रोक लगा दी। तब भी सुप्रीम कोर्ट की इस संवैधानिक शक्ति पर सवाल उठे थे। क्योंकि इसके चलते हजारों लोग बेरोजगार हुए थे।

बार एसो. मामले में भी दोहराया गया
सुप्रीम कोर्ट की ओर से ‘बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ’ मामले में भी इसे दोहराया गया था। इसमें यह कहा गया कि इस अनुच्छेद का उपयोग मौजूदा कानून को प्रतिस्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि एक विकल्प के तौर पर किया जा सकता है।

मणिपुर के मंत्री को मंत्रिमंडल से हटाया
एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के एक मंत्री को राज्य मंत्रिमंडल से हटा दिया था। वर्ष 2017 में उक्त मंत्री चुनाव जीतने के बाद दूसरे दल में शामिल हो गए थे।

शादी रद्द का मामला
22 साल से अलग रह रहे पति-पत्नी की शादी को रद्द करने के लिए और जेपी समूह और घर खरीदने वालों के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस शक्ति का प्रयोग किया था।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here