लव कुमार मिश्रा

पटना।बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने सातवीं पारी की शुरुआत हिट विकेट के साथ की है। भ्रष्टाचार और अनियमितता के आरोपों से घिरे शिक्षा मंत्री मेवालाल चौधरी की राज्य सचिवालय में मंत्री पद संभालने के दो घंटे के भीतर ही विदाई हो गई। बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति रहे शिक्षा मंत्री मेवालाल को राज्यपाल फागू चौहान ने बर्खास्त कर दिया। मेवालाल चौधरी फ़िलहाल अंतरिम जमानत पर हैं। पटना हाईकोर्ट में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का प्रकरण लंबित हैं। पटना और सबौर के राज्य सतर्कता विभाग ने उनके विरुद्ध पटना हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर रखा है।

मेवालाल चौधरी

बिहार कृषि विश्वविद्यालय में कुलपति रहते मेवालाल चौधरी द्वारा की गई गड़बड़ियों की जाँच पटना उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस एस एम आलम ने की थी। उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोविंद (अब राष्ट्रपति) को 20 नवंबर 2016 को सौंपी थी। जाँच में शिक्षकों और वैज्ञानिकों की नियुक्ति में उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता में हेरफेर, पक्षपात और विश्वविद्यालय के नियमों का पालन न करने समेत तमाम साक्ष्य मिले थे। न्यायमूर्ति आलम की रिपोर्ट मिलने के बाद तत्कालीन राज्यपाल ने मेवालाल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की, लेकिन गिरफ्तारी पर रोक के आदेश भी दे दिए। तब बिहार विधानसभा के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष सुशील कुमार मोदी ने मेवालाल के खिलाफ विधानसभा के अंदर और बाहर दोनों जगह अभियान चलाया था। उनके इस अभियान को जदयू नेताओं के एक वर्ग का भी समर्थन मिला था।

मेवालाल ने अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को नहीं छिपाया, फिर भी नीतीश कुमार ने उन्हें तारापुर विधानसभा सीट के लिए जेडीयू उम्मीदवार बनाया। जीत के बाद मंत्रिमंडल में शामिल कर उन्हें शिक्षा विभाग दिया । हालांकि, कुछ घंटे के भीतर ही स्थिति बदल गई और भाजपा के शीर्ष नेताओं ने नीतीश को अपने पसंदीदा मंत्री को बर्खास्त करने के लिए कहा। मंत्रिमंडल के गठन और मंत्रियों के नाम तय करने की प्रक्रिया में नीतीश के साथ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी शामिल थे, इस कारण मेवालाल को लेकर भाजपा हाईकमान परेशान हो गया। इसके अलावा भाजपा ने 2016-17 में दागी नेताओं को मंत्रिमंडल से बाहर करने का अभियान चलाया था। अभियान के बाद कुछ केंद्रीय मंत्री हटाए भी गए थे।

अब बिहार विधानसभा में जेडीयू के सदस्यों की संख्या काफी कम रह गई है और वह बिहार एनडीए में जूनियर साझीदार है। इस वजह से जेडीयू के मुख्यमंत्री पर बीजेपी ने हावी होना शुरू कर दिया है। बीजेपी ने अपने दो विधायकों को उपमुख्यमंत्री भी बना दिया है। बिहार भले केंद्र नियंत्रित राज्य और केंद्र शासित प्रदेश न हो, पर 16 नवंबर के बाद, बिहार भाजपा का नियंत्रित राज्य बन गया है। नीतीश कुमार को पिछले 15 वर्षों से मिली स्वायत्तता अब खत्म हो गई है। नीतीश कुमार स्वायत्तता का आनंद लेते थे और उन्हें वह पसंद भी था, लेकिन अब वे भाजपा नेताओं के आदेशों का पालन करने के लिए मजबूर हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

प्रधानमंत्री ने चुनाव अभियान के दौरान राज्य सरकार को डबल इंजन की सरकार बताया था। उन्होंने अपने भाषणों में खुले तौर पर सीएम से कहा, “पिछले 15 वर्षों में, आप ज्यादा कुछ नहीं कर सके। 12 साल से आपको काम करने की अनुमति नहीं है। यूपीए सरकार और राजद के साथ 18 महीनों में आप बहुत कुछ नहीं कर सकते थे। पीएम ने दावा किया कि नीतीश कुमार के एनडीए और केंद्र का हिस्सा बनने के दौरान उन्हें उदार सहायता देने से चार साल में राज्य में जो भी विकास हो सकता था, वह हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार के विकास पुरुष होने के दावे को लगातार खारिज किया। अब बिहार में डबल इंजन की सरकार है, लेकिन भाजपा का बुलेट इंजन बिहार में जेडीयू से अधिक शक्तिशाली है। नीतीश कुमार, जो अब तक स्वतंत्रता का आनंद ले रहे थे, अमित शाह और नरेंद्र मोदी की निगरानी में है।

नीतीश कुमार को अब अपनी सरकार के एजेंडे को बदलना होगा। जदयू के घोषणा पत्र में नीतीश कुमार द्वारा दिए गए सात निश्चय के भाग दो में बीजेपी के सुझावों को समायोजित करने के लिए संशोधन किया जा रहा है। भाजपा शासित राज्यों की लोकप्रिय ग्रामीण योजनाओं को बिहार में लागू करने के प्रस्ताव को शामिल किया जा रहा है। बीजेपी सांसद निशीकांत दुबे ने नीतीश कुमार को एक पत्र भेजकर शराबबंदी नियमों में गुजरात के फार्मूले को लागू करने का सुझाव दिया है। गुजरात में मेडिकल ग्राउंड पर शराब की परमिट मिलती है ।

सुशील कुमार मोदी ङ

नीतीश कुमार के पसंदीदा और पिछले 15 वर्षों से लगातार उनके जूनियर साथी सुशील कुमार मोदी अब सरकार से बाहर हैं। सुशील कुमार मोदी हमेशा साथ देते आए और भरोसेमंद सहयोगी रहे। अब उनके न होने से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को शराबबंदी पर अपने रुख और सात निश्चय पर समझौता करने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा। भाजपा का कहना है कि सात निश्चय एनडीए का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि वृहद गठजोड़ वाले इस कार्यक्रम को लागू करने के लिए जदयू और राजद के बीच समझौता हुआ था।

नीतीश कुमार राज्य विधानसभा के भीतर भी मजबूत स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि पहली बार युवा तेजस्वी प्रसाद यादव और जदयू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी की अगुवाई में वह एक आक्रामक विपक्ष का सामना करेंगे। आरजेडी 2020 के विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी सिंगल पार्टी के रूप में उभर कर आई है। आरजेडी के हारे हुए करीब 30 प्रत्याशियों ने चुनाव याचिका दायर कर पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। हारे प्रत्याशियों ने आरोप लगाया है कि उन्हें चार से लेकर 900 वोटों के बहुत कम अंतर से रिटर्निग आफिसरों द्वारा हराया गया है। डाक मतपत्रों की गणना में गड़बड़ी से ही ऐसा हुआ है।

कहते हैं जून 2013 की तरह भाजपा फिर नीतीश को गच्चा देने की कोशिश होती है ,तो उनके पास निश्चित एक आकस्मिक योजना तैयार होगी। जब उन्होंने 2013 में भाजपा से किनारा कर कांग्रेस की मदद से सरकार चलाना जारी रखा था, तब कांग्रेस के सात और राजद के 13 विधायकों को तोड़ लिया था। नीतीश कुमार अपने अस्तित्व बचाने के लिए कोई भी जोखिम उठा सकते हैं और व्यवस्था कर सकते हैं। आरजेडी और कांग्रेस के विधायकों को भी अपने पाले में करने से नहीं चूकेंगे।

कांटे के टक्कर वाले विधानसभा सीट जैसे किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, अररिया और सुपौल के सीमांचल क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता जदयू के बचाव में आए और उन्होंने राजद और कांग्रेस के उम्मीदवारों को खारिज कर दिया। इन इलाकों में नीतीश कुमार को एक अघोषित मित्र असादुदीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) का मौन समर्थन मिला। एआईएमआईएम ने सीमांचल क्षेत्र में पांच सीटें जीतकर महागठबंधन की संभावनाओं को कम कर दिया। वहीँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य भर में अपनी 12 जनसभाओं में महा जंगल राज के खतरे और सूर्यास्त के बाद लकड़सुंघवा का बार-बार जिक्र कर राजद के खिलाफ वातावरण बना दिया। राजद के खिलाफ उनका लक्ष्य निशाने पर लगा और खासकर महिला मतदाताओं को राजद से दूर रखने में यह अस्त्र काम आ गया।

मिथिला और कोसी क्षेत्रों ने भाजपा को चुनावों में एक बड़ी बढ़त दिलाई । इन क्षेत्रों में प्रचार के वक्त कश्मीरी आतंकवादियों के खतरे को उठाया गया। भाजपा नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर राजद सत्ता में आया, तो कश्मीरी आतंकवादियों को बिहार में एक सुरक्षित मार्ग मिलेगा। पहले दो चरणों के चुनाव के बाद जहां एनडीए को सर्वे में दूसरे या तीसरे स्थान पर रखा गया था, वहीँ तीसरे चरण के अभियान में, उग्रवाद, चीन के खिलाफ अभियान और राष्ट्रवाद से माहौल बदला, जिसके चलते कांग्रेस के सवर्ण ब्राह्मण वोट बैंक में भाजपा सेंध लगाने में कामयाब हो गई ।

नई सरकार के ब्लू प्रिंट को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। भाजपा द्वारा 19 लाख से अधिक नौकरियों का वादा किया गया है जो अब तक एजेंडा में नहीं है। प्रवासी श्रमिकों की समस्या के समाधान के वादे पर भी सरकार अभी चुप्पी साधे हुए है। बिहार के लोगों को फ्री में कोरोना वैक्सीन देने के वादे पर भी कुछ नहीं कहा जा रहा है।

चिराग पासवान

चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी ( एलजेपी ) राज्य भर में अपनी मौजूदगी का अहसास कराने में सफल रही, फिर भी वह केवल एक ही सीट जीत सकी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मानें तो एलजेपी ने 38 विधानसभा क्षेत्रों में जेडीयू के उम्मीदवारों को नुकसान पहुँचाया और उन्हें जीत से दूर रखा। चिराग पासवान का मिशन ही था नीतीश को सत्ता से दूर रखना। चुनाव अभियान के दौरान चिराग पासवान बार-बार अपने मिशन की घोषणा करते थे और नीतीश कुमार की हार सुनिश्चित बताते थे। 2015 के चुनावों में 71 सीट जीतने वाली जेडीयू 10 नवंबर को 43 सीटों पर अटक गई ।

चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद नीतीश कुमार को मीडियाकर्मियों से अनुरोध करते हुए देखा गया। उन्होंने आग्रह किया “कृपया मुझे अहंकारी मत कहो”। प्रचार के वक्त उन्होंने मीडियाकर्मियों को चुनौती दी थी और कहा था उनकी विकास योजनायें मीडिया के नकारात्मक अभियान पर भारी पड़ेंगे । प्रेस कांफ्रेस में मीडिया के लोगों ने नीतीश कुमार को याद दिलाया कि आप स्वयं लॉकडाउन के बाद अलग-थलग और अधिकारियों से प्रतिक्रिया पर निर्भर रहे , जबकि हम गांवों से रिपोर्टिंग कर रहे थे ”।

नीतीश कुमार ने अपने को सुधारने और अपने साप्ताहिक जनता दरबार के माध्यम से लोगों के लिए उपलब्ध होने का वादा किया है। अपने को पीएम मटैरियल मानने वाले नीतीश पर 2020 की हार का तत्काल प्रभाव पड़ा है , ये वही नीतीश कुमार हैं जिन्होंने सालों पहले नरेंद्र मोदी को अस्वीकार कर दिया था और डीनर प्लेट हटा ली थी।

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