प्रो. बिजय कुमार

जिला अध्यक्ष,
प्राइवेट स्कूल एंड चिल्ड्रेन वेलफेयर एसोसिएशन, नवादा (बिहार)

काल का चक्र चलते रहता है। इसी में पूरे जनमानस को भी चलना पड़ता है। कालांतर स्कूलों के साथ सरकार अजीब मजाक करती रहती है। थोड़ी सी गर्मी पड़ी- स्कूल बंद, थोड़ी सी ठंढ पड़ी- स्कूल बंद। जहाँ आधा बिहार बाढ़ और बरसात से तबाह है वहां तो स्कूल बंद होना स्वभाविक घटना सी होती है। विगत जनवरी-फरवरी स्कूल को बंद रखा गया- ठंडक बढ़ने से, स्कूल खुलने के बाद हालात सामान्य भी नहीं हो पाया था कि होली की छुट्टी हो गई। छुट्टी के बाद वार्षिक परीक्षा होनी थी। अभी शुरुआत करने की सोंच ही रहे थे कि कोरोना काल का शुरुआत हो जाता है। तब से अब तक स्कूल बंद है। स्कूल का बंद होना कि 80% अभिभावकों के लिए सुखद एहसास होता है। किसी भी कारण से स्कूल बंद हो तो वैसे अभिभावक स्कूल झाँकते तक नहीं। उन्हें लगता है कि इसी बहाने शिक्षण-शुल्क जमा करने से तो बचते हैं। प्राइवेट स्कूलों में शिक्षक एवं शिक्षाकर्मियों का वेतन प्रत्येक माह जमा होने वाला शिक्षण- शुल्क पर ही निर्भर करता है। सवाल है की 80% अभिभावक स्कूल आते ही नहीं तो शिक्षण शुल्क जमा कैसे होगा ? शिक्षक एवं शिक्षा कर्मियों का वेतन कैसे मिलेगा ? लगातार पांच माह से छोटे या बड़े किसी भी स्कूल में वेतन भुगतान नहीं हो पाया। स्थिति जर्जर हो चुकी है, शिक्षक या शिक्षाकर्मी कोई दूसरा काम नहीं कर सकते और इस लॉक लॉक डाउन में उन्हें काम देगा कौन ? पाँच माह से उनका परिवार कैसे चल रहा है उनकी व्यथा लिखने का साहस करने के लिए मुंशी प्रेमचंद जैसे का कहानीकार चाहिए।
सरकार या तो गरीब मजदूरों की चिंता करती है या फिर अदानी,अंबानी जैसे उद्योगपतियों की।
गरीबों के खाते में भी पैसे पहुंच रहे हैं, चावल दाल आदि सामान मिल रहा है, अमीरों को ही मन मुताबिक सुविधा मिल रही है। प्राइवेट स्कूल के शिक्षक शिक्षा- कर्मी या उनके बच्चे राहत कैंप में जाकर खाना भी नहीं ले सकते कयोंकि ऐसा संस्कार उन्हें मिला ही नहीं।

पूरे बिहार में छोटे- बड़े मिलाकर कुल 25,000(पच्चीस हजार) प्राइवेट स्कूल हैं। प्रत्येक प्राइवेट स्कूल में औसतन 20 लोग काम करते हैं। इस प्रकार 5,00,000(पाँच लाख) परिवार अभी भुखमरी को झेल रहा है। इस 500000(पाँच लाख) परिवार पर भी आधारित कम से कम 500000 (पाँच लाख)लोग होंगे। जिनकी आय समाप्त हो गई है। इस प्रकार बिहार में 1000000(दस लाख) परिवार भूख से लड़ाई लड़ रही है। इसकी चिंता न तो बिहार सरकार को है नाहि केंद्र सरकार को। ऐसा लगता है कि कोरोना से मरने वालों से ज्यादा संख्या हो जाएगी हो जाएगी भूख से मरने वालों की। इस प्रकार प्राइवेट स्कूल केवल बिहार में ही नहीं है बल्कि पूरे देश भर में दो लाख स्कूल हैं जिसपर आधारित कुल अस्सी लाख लोग भूख की लड़ाई लड़ रहे हैं।
हम सभी स्कूल वाले इस समस्या की जानकारी अपने मुख्यमंत्री को पूरे बिहार से100000(एक लाख) की संख्या में पत्र लिखकर और प्रधानमंत्री को पूरे देश भर से 2000000 (बीस लाख)पत्र लिखकर देने का कार्य पुरा किया है। लेकिन कोई असर नहीं हुआ ना तो हमारे मुख्यमंत्री इस पर कुछ बोल पाए और ना ही प्रधानमंत्री अपने 20 लाख करोड़ पैकेज में कोई हिस्सा प्राइवेट स्कूलों को दे पाए।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमारी सरकार शिक्षा का अधिकार(आरटीई) के तहत प्राइवेट स्कूलों में 25% बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा प्राइवेट स्कूलों को दिया है। जिसे हम सब प्राइवेट स्कूल बखूबी निभा भी रहे हैं। इसके लिए केंद्र सरकार सर्वशिक्षा के माध्यम से बिहार सरकार को प्राइवेट स्कूलों को देने के लिए प्रतिपूर्त्ति राशि देती है। यह प्रतिपूर्ति राशि विगत 3 साल से बिहार सरकार नहीं दे रही है अर्थात् सत्र 2017-18,2018-19,2019- 20 की कुल राशि बकाया है। प्राइवेट स्कूलों को मिलने वाली यह राशि बिहार सरकार ने अन्यत्र खर्च कर दिया है। कोरोना काल की इस बिगड़ती दशा में अगर शिक्षा का अधिकार(आर टी ई) वाला प्रतिपूर्ति राशि भी प्राइवेट स्कूलों को सरकार दे देती तो तत्काल स्कूलों को राहत की सांस मिलती।
बड़ी तकलीफ होती है इस देश में जो भी नियम कानून बनता है सिर्फ जन सामान्य के लिए यानि सिर्फ स्कूल चलाने वालों के लिए स्कूल में काम करने वाले शिक्षक शिक्षाकर्मियों के लिए। सरकार में काम करने वाले लोग किस नियम- कानून के तहत स्कूल को मिलने वाली प्रतिपूर्ति राशि को अन्यत्र खर्च कर देते हैं ?क्या यह उनका गुनाह नहीं है ?क्या इसके लिए उन्हें भी सजा मिलनी चाहिए?
हम सभी चाहते हैं कि हैं इस महामारी काल में बच्चों का कोई अहित ना हो, पहले बच्चे हैं, तब तो स्कूल है और तब शिक्षक व शिक्षकेत्तर- कर्मी।
हम सबों की जान प्यारी है। सब सुरक्षित रहें,चाह हमारी है।।
सोशल मीडिया से जानकारी मिल रही है कि यह बीमारी अगले 10 सालों तक लगातार चलती रहेगी तो क्या अगले 10 सालों तक स्कूल कॉलेज बंद रहेंगे?हम समझते हैं, जब तक टिका नहीं निकले तब-तक टिके रहना है।
बिहार सरकार से अपेक्षा की जाती है विगत 3 वर्ष का आरटीई वाला प्रतिपूर्ति राशि का भुगतान करें, बिजली बिल, मकान किराया, गाड़ी का किस्त, गाड़ी पर लगने वाला टैक्स एवं स्कूल का अन्यान्य खर्च के लिए बिहार सरकार पूरे बिहार के प्राइवेट स्कूलों के लिए धन की व्यवस्था करें।
प्राइवेट स्कूल के लोग राजनीति नहीं करते हैं। अपना दिन का 24 घंटा और साल भर में 365 दिन स्कूल चलाने और अपने बच्चों के विकास में लगाते हैं। यदि स्कूल वाले लोग अपना दिमाग राजनीति में लगा दें तो पूरे बिहार से किसी की सरकार भी बदल देने की क्षमता रखते हैं। सरकार का नारा है “न्याय के साथ विकास” यह नारा शिक्षकों को भूखा रखकर कैसे पूरा किया जा सकता है ? हम सब जानते हैं कि “जब तक शिक्षक भूखा है ज्ञान का सागर सूखा है।”
प्राइवेट स्कूल आज बिहार का 80% से 90% बच्चों को पढ़ाता है सरकारी स्कूल में बच्चों का जो भी नाम रहता है उसमें अधिकांश बच्चे प्राइवेट स्कूल में ही पढ़ते हैं। कहा जाए तो प्राइवेट स्कूल आज बिहार की शिक्षा की अस्मिता है, फिर भी सरकार अपनी अस्मिता की अनदेखी कर रही है। यह सरकार की अनदेखी है या अहंकार। यह भी हो सकता है कि मैकाले ने कहा था कि “भारत में अधिक समय तक राज करना हो तो यहां की शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करो।” शायद सरकार इसी सिद्धांत पर काम कर रही हो।
अंत में कहना चाहूंगा कि किसी विद्वान या विशेषज्ञ का ही ध्यान इस चिन्तनीय बिषय पर आएगा तब इसे प्राथमिकता दी जाएगी।

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