शिवम द्विवेदी की रिपोर्ट

पटना,03 जुलाई.पटना हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से तीन दिन में यह पूछा है कि सूबे में मक्के की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी ) पर क्यों नहीं खरीद की जा रही है?
मुख्य न्यायाधीश संजय करोल व न्यायमूर्ति एस कुमार की खण्डपीठ ने महेंद्र यादव द्वारा दायर जनहित याचिका को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर सुनते हुए उक्त निर्देश दिया .
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विकास पंकज ने कोर्ट को बताया कि कोशी समेत बिहार के कई हिस्सों में मक्का उगाने वाले किसान बेहाल हैं . पिछले वर्ष की तुलना में राज्य सरकार ने मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य घटा दिया है.फिर भी तैयार फसल की ख़रीदगी के लिए राज्य सरकार कोई कदम नही उठा रही है . मक्के की तैयार फसल के समुचित भंडारण की भी व्यवस्था नहीं है. सरकारी ख़रीदगी के अभाव में कोशी व सीमांचल में बड़े फैमाने पर फसल की कटाई रुकी हुई है.
नेपाल से आने वाली नदियां उफान पर है .इससे बाढ़ का खतरा बढ़ गया है क्योंकि बाढ़ आने और पानी फैलने से हज़ारों टन फसल बर्बाद हो सकता है.
स्थिति की गंभीरता को संज्ञान में लेते हुए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से तीन दिनों में जवाब दायर करने का निर्देश दिया है . इस मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद होगी .

केंद्र सरकार ने 2 जून को धान समेत 17 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का ऐलान किया है.। मक्का के लिए वर्ष 2020-21 के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 रुपए तक किया गया है। सरकार फसलों की कीमत और लागत तय करने वाले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की रिपोर्ट के हवाले से 50 फीसदी मुनाफा देने की बात कह रही है उसके मुताबिक एक कुंतल मक्का पैदा करने में 1213 रुपए की लागत आती है। लेकिन मंडियों और बाजार में किसानों में मुनाफा तो दूर लागत से काफी नीचे अपनी फसल बेचनी पड़ रही है। दूसरी ओर किसानों का कहना है कि “सरकार के ही आंकड़ों पर चलें तो किसानों को लागत पर ही 213 से 313 रुपए प्रति कुंतल (1213 रुपए लागत ) का घाटा हो रहा है.एक एकड़ मक्के की खेती में बुवाई से लेकर कटाई तक करीब 14-16 हजार रुपए की लागत आती है,जिसमें किसान की मेहनत और जमीन का किराया शामिल नहीं होता है।

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